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आत्महत्या ईश्वर का अपमान क्यों है? कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Premendra Agrawal January 16, 2023
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वेद सहित सभी हिन्दू धर्म ग्रंथों नेआत्महत्या या सासामूहिक आत्महत्या को पाप ही नहीं बताया बल्कि इसे ईश्वर का अपमान भी कहा है। यह सत्य धर्म प्रिय भारत के नेतृत्व और जनता समझती है। अतएव वेदिक नेतृत्व और जनता का कर्तव्य है कि वे कम से कम आत्महत्या से जीरो आत्महत्या प्राप्ति की ओर बढ़ें।

वेदों की उद्घोषणा है- प्रज्ञानाम ब्रह्म, अहम् ब्रह्मास्मि, तत्वमसि, अयम आत्म ब्रह्म, सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति अर्थात- ब्रह्म परम चेतना है, मैं ही ब्रह्म हूं, तुम ब्रह्म हो, यह आत्मा ब्रह्म है और यह संपूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्मरूप है, क्योंकि यह जगत् ब्रह्म से ही उत्पन्न होता है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ सभी प्राणियों को अपनी आत्मा के समान मानो। कंकर-कंकर में शंकर का वास है इसीलिए जीव हत्या को ‘ब्रह्महत्या’ माना गया है।

सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है इसका सबूत है वेद।वेद वैदिककाल की वाचिक परंपरा की अनुपम कृति हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले 6-7 हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है। ध्यान और मोक्ष निर्वाण अर्थात जीरो शून्य o भारत अर्थात सनातन हिन्दू धर्म की ही देन है।

वैदक जनों केलिए जीवन ही है प्रभु। कर्म करने के साथ साथ जरूरी नियमों की भी जरूरत होती है। 

जीवन के 4 पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसके लिए अनुशासन और कर्तव्य पालन जरूरी है। सनातन धर्म ने मनुष्य की हर गतिविधि को वैज्ञानिक नियम में बांधा है। वैदिक प्रार्थना और ध्यान तथा देश समाज सेवा से भी हमारा धर्म है। अथर्ववेद में सुख-संपदा, स्वास्थ, शत्रुविनाश आदि से संबंधित अनेकों मंत्रों का संग्रह है। उनमें से एक है:

यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः, एवा मे प्राण मा विभेः।

जिस प्रकार आकाश व पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो। कभी किसी भी प्रकार का भय नहीं पालना। संयम के साथ निर्भिकता होना जरूरी है। डर सिर्फ ईश्वर का रखें।

अथर्ववेद में सुख-संपदा, स्वास्थ, शत्रुविनाश आदि से संबंधित अनेकों मंत्रों का संग्रह है। ये ही सब जीवन की कला है।

संसार में मुख्यतः दो प्रकार के धर्म हैं। एक कर्म-प्रधान दूसरे विश्वास-प्रधान। हिन्दू धर्म कर्म-प्रधान है, अहिन्दू अर्थात गैर सनातनी धर्म विश्वास-प्रधान। जैन, बौद्ध, सिख ये तीनों सनातन के अंतर्गत हैं। इस्लाम, ईसाई, यहूदी ये तीनों अहिन्दू धर्म के अंतर्गत हैं। हिन्दू धर्म लोगों को निज विश्वासानुसार ईश्वर या देवी-देवताओं को मानने व पूजने की और यदि विश्वास न हो तो न मानने व न पूजने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है। अहिन्दू धर्म में ऐसी स्वतंत्रता नहीं है। RSS प्रमुख श्री मोहन भगवत जी कभी हाल ही के जो वक्तव्य हैं और क्रिस्चियन एवं मुस्लिम धर्म गुरुओं से मुलाकातें हैं वे इसी के प्रमाण हैं।

नरेंद्र मोदी जी की भी विश्व के क्रिस्चियन और मुस्लिम देशों  के प्रमुखों से जो दोस्ताना और आत्मीयता पूर्ण सम्बन्ध हैं यह भी प्रमाण है कि वसुधैव कुटुम्कम वैदिक जनों का ध्येय वाक्य है, सह-अस्तित्व की स्वीकार्यता है।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दु:ख भाग्भवेत।।

अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।

उदारता और सहिष्णुता हमारे रोम रोम में है। भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां उसकी भिन्नता ही उसकी एकता का कारण बनी हुई है। भिन्नता में एकता का कारण हिन्दू धर्म की सहिष्णुता और उदारता के कारण ही है।

जीवन के हर क्षेत्र और प्रकृति को समझकर ही जो संस्कार और कर्तव्य बताएं गए हैं वह मनोविज्ञान और विज्ञान पर ही आधारित हैं। वैदिक जन पुनर्जन्म में विश्वास रखते है। वैदिक जन पुनर्जन्म में विश्वास रखते है। श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 22वें श्लोक में कहा गया है- ‘जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार यह जीवात्मा भी पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करता है।’ चौथे अध्याय के 5वें श्लोक में कहा गया है- ‘हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत गए हैं। बस फर्क यह है कि मैं उन सबको जानता हूं, परंतु हे परंतप! तू उसे नहीं जानता।’

वैदिक धर्म और उसे मानने वाला धर्मावलम्बी पंथ निरपेक्ष भारत विस्तारवादी नहीं है। हम मानते हैं कि कंकर-कंकर में शंकर है अर्थात प्रत्येक कण में ईश्वर है। इसका यह मतलब नहीं कि प्रत्येक कण को पूजा जाए। इसका यह मतलब है कि प्रत्येक कण में जीवन है। वृक्ष भी सांस लेते हैं और लताएं भी। वेदों में प्रकृति के हर तत्व के रहस्य और उसके प्रभाव को उजागर किया गया है।

पुराणों में परोपकार : राजा रंतिदेव को 40 दिन तक भूखे रहने के बाद  भोजन मिला तो भी उन्होंने शरण में आए भूखे अतिथि को वह भोजन देकर प्रसन्न हुए। दधीचि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी अस्थियां तक दे दी, शिव जी  ने विष का पान कर लिया, कर्ण ने कवच और कुंडल दान दे दिए, यह है भारत की वैदिक शाश्वत परम्परा।

हिन्दू धर्म अर्थात सनातन धर्म को दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म माना जाता है। उद्देश्य है – चलो हम सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाएं:

वेद और अन्य धर्म ग्रंथों में आत्महत्या को निंदनीय माना जाता है, क्योंकि धर्म के अनुसार कई योनियों के बाद मनुष्य जीवन मिलता है। ऐसे में उसे पूरा जीना चाहिए समय के पूर्व उसे ख़त्म नहीं करना चाहिए और मानव कल्याण के लिए कुछ अच्छे काम करने चाहिए। पद्म पुराण में 84 लाख योनियों का जिक्र मिलता है, पशु, पक्षी, कीड़े, मनुष्य, पेड़, पौधे आदि मिलकर 84 लाख योनियों बनाते हैं।

अथर्ववेद में त्वां मृत्युर्दयतां मा प्र मेष्ठा: कह कर बताया कि मृत्यु तेरी रक्षा करे और तू समय से पूर्व न मरे। अथर्ववेद में ही उत तवां मृत्योरपीपरं कह कर वेद भगवान ने संदेश दिया हे जीवात्मा मैं मृत्यु से तुझको ऊपर उठाता हूं। मृत्यो मा पुरुषवधी: कह कर वेद ने संदेश दिया कि हे मृत्यु तू पुरुष को समय से पूर्व मत मार।

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार

भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य का जन्म मिलना बहुत दुर्लभ है यह शरीर बार बार नहीं मिलता जैसे पेड़ से झड़ा हुआ पत्ता वापस पेड़ पर नहीं लग सकता।

मनुष्य जीवन दुर्लभ क्यों हैं? क्यूंकि जीवन एक ही बार मिलता है और क्या पता कब क्या और जन्म होगा।

भगवान बुद्ध ने तो यहाँ तक कहा हैकि ‘जो मनुष्य रूप में जन्म लेना है, वह देवताओं को भी सुगति प्रदान करताहै।’

भगवद गीता के अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य कृष्ण का शुद्ध भक्त बनना है। ज्ञान योग या अष्टांग योग का अभ्यास करने वाले भी अंततः इसे समझते हैं। इसलिए, हमें अपने मानव जीवन का सही उपयोग करना चाहिए और बिना किसी भौतिक उद्देश्य के गंभीरता से कृष्ण भक्ति करनी चाहिए, जैसा की भगवद गीता में कहा गया है। गीता में कर्म योग को सर्वश्रेष्ठ कहा हैं, सांख्य या भक्ति योग से भी श्रेष्ठ। अतः कर्म करो आसक्ति और फल कि चाहत के विना।

 “कई जन्मों और मृत्युओं के बाद, जो वास्तव में ज्ञान में है, वह मुझे सभी कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में जाता है। ऐसी महान आत्मा दुर्लभ है।”

भगवद गीता 7.19

वेदांत का चिंतन दुर्लभ मानव जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है। भारतीय वेदों और उपनिषदों के सूत्र हर युग में प्रासंगिक हैं। यह देश के महापुरुषों की महिमा का ही प्रमाण है कि आज भी सद्कर्मों का प्रवाह निरंतर जारी है। 

ऋग्वेद में कहागया है कि हम भी श्रेष्ठ बनें और सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाएं।

।।यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः।।1।।– अथर्ववेद

अर्थ: जिस प्रकार आकाश एवं पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो।

भय से जहां शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं वहीं मानसिक रोग भी जन्मते हैं और इसीसे आत्महत्या या सामूहिक हत्या के भाव जन्म ली हैं। । डरे हुए व्यक्ति का कभी किसी भी प्रकार का विकास नहीं होता। संयम के साथ निर्भिकता होना जरूरी है। डर सिर्फ ईश्वर का रखें।

वेदांत का चिंतन दुर्लभ मानव जीवन को श्रेष्ठता की ओर ले जाता है। भारतीय वेदों और उपनिषदों के सूत्र हर युग में प्रासंगिक हैं। यह देश के महापुरुषों की महिमा का ही प्रमाण है कि आज भी सद्कर्मों का प्रवाह निरंतर जारी है। 

।।यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः।।1।।– अथर्ववेद

अर्थ : जिस प्रकार आकाश एवं पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो।

भय से जहां शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं वहीं मानसिक रोग भी जन्मते हैं और इसीसे आत्महत्या या सामूहिक हत्या के भाव जन्म ली हैं। । डरे हुए व्यक्ति का कभी किसी भी प्रकार का विकास नहीं होता। संयम के साथ निर्भिकता होना जरूरी है। डर सिर्फ ईश्वर का रखें।

आदि जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार तीन कृपाएं अत्यंत दुर्लभ हैं, मनुष्य देह, मुमुक्षा अर्थात भगवान को पाने की भूख और तीसरा है महापुरुष का मिलना। इसमें से मनुष्य शरीर का मिलना सबसे दुर्लभ है। देवी देवता भी इसे पाने के लिए तरसते हैं। क्योंकि केवल  मनुष्य जीवन ही ज्ञान और कर्मप्रधान होता है। ज्ञान तो देवताओं में भी होता है, लेकिन कर्म करने का अधिकार उन्हें नहीं होता। यदि हमने ज्ञानशक्ति का सही दिशा अर्थात परमार्थ के लिए उपयोग नहीं किया तो यह उसका दुरुपयोग ही होगा।

भगवान की कृपा से ही यह मानव तन प्राप्त होता है। ईश्वर की लीला अनंत है, इस कारण कभी-कभी इतर योनियों में भी मुक्ति ईश्वर की कृपा से मिलती है, पर मोक्ष हेतु अवसर तो मानव के पास ही है–

नर समान नहिं कवनिउ देहि। देत ईस बिन हेतु सनेही।।

बड़े भाग मानुष तनु पावा।  सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हिं गावा।।

वैदिक ग्रंथों में आत्महत्या करनेवाले व्यक्ति के लिए एक श्लोक लिखा गया है, जो इस प्रकार है…

असूर्या नाम ते लोका अंधेन तमसावृता। तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।।

अर्थात: आत्मघाती मनुष्य मृत्यु के बाद अज्ञान और अंधकार से परिपूर्ण, सूर्य के प्रकाश से हीन, असूर्य नामक लोक को जाते हैं।

#धर्मग्रंथों_के_अनुसार जिन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति आत्महत्या करता है, उनका हल उसे जिंदा रहने पर तो मिल सकता है लेकिन आत्महत्या करके अंतहीन कष्टों वाले जीवन की शुरुआत हो जाती है। इन्हें बार-बार ईश्वर के बनाए नियम को तोड़ने का दंड भोगना पड़ता है।

गरुड़ पुराण कहता है कि अपने कर्मों का परिणाम हर हाल में भोगना पड़ता है। जीवन से भगाने का प्रयास करने पर भी इनसे बच नहीं सकते बल्कि आत्मघात के परिणाम और कष्टकारी होते हैं। आत्मघात किसी भी तरह से मोक्ष नहीं दिला सकता है। विष्णु पुराण में श्रीकृष्ण ने मोक्ष प्राप्ति के लिए साधना करने का ज्ञान दिया है ना कि आत्मघात का।

आत्महत्या का दंड क्या होता है इस विषय में गरुड़ पुराण कहता है कि दंड स्वरुप आत्महत्या करने वाले की आत्मा अधर में लटक जाती है।  आत्महत्या निंदनीय है, क्योंकि धर्म के अनुसार कई योनियों के बाद मानव जीवन मिलता है ऐसे में उसे व्यर्थ गंवा देना मूर्खता और अपराध है।इसीलिए आत्महत्या करने के बाद जो जीवन होता है वो ज्यादा कष्टकारी होता है।

कृष्ण भगवान भगवद्गीता में अर्जुन कौ एक हि सन्देश देते हैं कि मोह त्याग, कर्म करने कौ खड़ा हो जा, आसक्ति छोड़, सुख दुख में समत्व भाव अपना, व्यक्ति कौ कर्म करने में अधिकार हैं, फल में नहीं. इस

अर्थात रामायण हो या गीता धर्म स्थापना और असुर नाश सज्जन को राहत ही भगवान के अवतरित होने के मुख्य करण है.

मानव शरीर के बारे में संत तुलसीदास जी ने कहा है ➖

“बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा।

साधन् धाम मोक्ष कर द्वारा, पाई न जेहिं परलोक सँवारा।।“

यह मानव तन अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह साधन योनि है, जिससे हम अपना परलोक सुधार सकते हैं, यह मानव तन ही मोक्ष का द्वार भी है। –

“साधन धाम मोक्ष कर द्वारा।”

प्रसंग “रामगीता” का है, मानव जीवन प्राप्त कर विषय–वासनाओं में मन लगाना, अमृत के बदले विष ग्रहण करने जैसी मूर्खता है और इसे कोई भी अच्छा नहीं कहता, यथा–

नरतनु पाइ बिसय मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ विष लेहीं।।

ताहि कबहुँ भल कहइ कि कोई। गुंजा ग्रहइ परसमनि खोई।।

आत्महत्या (लैटिन suicidium, sui caedere से, जिसका अर्थ है “स्वयं को मारना”) जानबूझ कर अपनी मृत्यु का कारण बनने के लिए कार्य करना है।

एकमात्र मनुष्य तन के द्वारा ही कर्म करके हम कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं। यह मानव जीवन सब कुछ दे सकने का सामर्थ्य रखता है:

नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी। ज्ञान विराग सकल सुख देनी।।

अतः यह सिद्ध है, कि मनुष्य के समान कोई शरीर नहीं है, जिसकी याचना देव भी करते हैं–

“नर समान नहि कवनिउ देही।”

यह बडभागी मानव तन को पाकर भी जिसने अपना परलोक नहीं सँवारा उसके भाग्य में पछताने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता और वह दु:ख भोगता है।–

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा।।

सो परत्र दु:ख पावई , सिर धुनि– धुनि पछ्तिाइ।

चूँकि ईश्वर की बड़ी कृपा से ही हमें यह मानव शरीर प्राप्त होता है–

कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस  बिनु हेत सनेही।।

इस कारण इस शरीर को विषयों में जाया करना कहां तक समझदारी है,  स्वर्ग भी तो अल्प समय के लिए होता है और अन्तत: दु:ख ही भोगना पड़ता है।

यहि तन कर फल विषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दु:खदायी।।

आत्महत्या (लैटिन suicidium, sui caedere से, जिसका अर्थ है “स्वयं को मारना”) जानबूझ कर अपनी मृत्यु का कारण बनने के लिए कार्य करना है। इसमें सुसाइड बॉम्बर्स फिदायीन भी सम्मलित हैं। Pakitan is the founder of fidayeens aaaand suicide bombers.

पाकिस्तानी टेररिस्ट की ये कैसी मां! आतंकी बेटे के कत्लेआम पर दी शाबासी तू जाबांज है. तू साहसी है. अल्लाह तुम्हें जन्न्त दे!

सामूहिक हत्या भी इसी श्रेणी में आती हैं। सामूहिक आत्महत्या का एक उदाहरण 1978 में “जॉन्सटाउन” पंथिक आत्महत्या (कल्ट सुसाइड) का है जिसमें जिमजोन्स के नेतृत्व वाले एक अमरीकी पंथ पीपुल्स टेम्पल के 918 सदस्यों ने साइनाइड से अंगूर के रस से बने स्वाद वाले साधन द्वारा अपना जीवन समाप्त किया था। साइपान युद्ध के अंतिम दिनों में 10,000 से अधिक जापानी नागरिकों ने “आत्महंता चोटी” और “बान्ज़ाई चोटी” से कूद कर आत्महत्या कर ली थी।

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